धातु पर एक हिन्दी लेख

प्रस्तावना
संस्कृत भाषा विश्व की सबसे प्राचीन और वैज्ञानिक भाषाओं में से एक मानी जाती है। इसकी व्याकरणिक संरचना अत्यंत व्यवस्थित और तर्कसंगत है। इस भाषा की मूल इकाई धातु कहलाती है। धातु वह मूल शब्द होता है जिससे अनेक शब्दों, क्रियाओं और वाक्यों का निर्माण होता है। यदि संस्कृत भाषा को एक विशाल वृक्ष माना जाए तो धातु उसकी जड़ के समान है।
संस्कृत के प्रसिद्ध व्याकरणाचार्य पाणिनि ने अपने ग्रंथ अष्टाध्यायी में धातुओं का विस्तृत वर्णन किया है। संस्कृत के अधिकांश शब्द इन्हीं धातुओं से बने होते हैं। इसलिए कहा जाता है कि संस्कृत को सही ढंग से समझने के लिए धातुओं का ज्ञान अत्यंत आवश्यक है।
धातु का अर्थ
“धातु” शब्द का अर्थ है – धारण करने वाला या मूल आधार। व्याकरण में धातु वह मूल रूप है जिससे क्रिया या शब्द की उत्पत्ति होती है। जैसे –
गम् – जाना
कृ – करना
भू – होना
पा – पीना
इन धातुओं से अनेक शब्द बनते हैं। उदाहरण के लिए –
गम् से – गच्छति, गमन, गमनशील
कृ से – करोतिः, कार्य, कर्म
भू से – भवति, भविष्य, भाव
इस प्रकार धातु शब्दों की उत्पत्ति का मूल स्रोत है। (Tarun's Blog)
धातुओं की संख्या
संस्कृत में धातुओं की संख्या बहुत अधिक है। परंपरागत रूप से लगभग 2000 से अधिक धातुएँ मानी जाती हैं। इनका संग्रह “धातुपाठ” नामक ग्रंथ में मिलता है। इन धातुओं के आधार पर हजारों शब्द और क्रियाएँ बनती हैं। (Open Pathshala)
धातुओं का वर्गीकरण
संस्कृत व्याकरण में धातुओं को उनके रूप और प्रयोग के आधार पर विभिन्न वर्गों में विभाजित किया गया है। मुख्य रूप से इन्हें दस गणों (Classes) में रखा गया है। जैसे –
भ्वादि गण
अदादि गण
जुहोत्यादि गण
दिवादि गण
स्वादि गण
तुदादि गण
रुधादि गण
तनादि गण
क्र्यादि गण
चुरादि गण
इन गणों के आधार पर धातुओं के रूप बनते हैं और उनके साथ विभिन्न प्रत्यय जुड़ते हैं।
धातु के प्रकार
धातुओं को उनके प्रयोग के आधार पर तीन मुख्य प्रकारों में विभाजित किया जाता है –
परस्मैपदी धातु – जिनका फल दूसरे के लिए होता है।
उदाहरण – पठति (वह पढ़ता है)आत्मनेपदी धातु – जिनका फल स्वयं के लिए होता है।
उदाहरण – लभते (वह प्राप्त करता है)उभयपदी धातु – जो दोनों प्रकार से प्रयोग हो सकती हैं।
धातु से बनने वाले शब्द
संस्कृत में अधिकांश शब्द धातुओं से ही बनते हैं। धातु में उपसर्ग और प्रत्यय जोड़कर नए शब्द बनाए जाते हैं। उदाहरण –
धातु : कृ (करना)
प्र + कृ = प्रकरोति
सम् + कृ = संकर
कृ + त = कृत
कृ + य = कार्य
इसी प्रकार –
धातु : गम् (जाना)
गच्छति – जाता है
गमन – जाना
आगमन – आना
इससे स्पष्ट होता है कि एक ही धातु से कई शब्द बन सकते हैं।
धातु रूप
धातु से विभिन्न कालों और पुरुषों के अनुसार क्रिया रूप बनाए जाते हैं जिन्हें धातु रूप कहा जाता है। संस्कृत में मुख्यतः दस लकार होते हैं, जैसे –
लट् – वर्तमान काल
लङ् – भूतकाल
लृट् – भविष्यकाल
लोट् – आदेश
उदाहरण – पठ् (पढ़ना) धातु के कुछ रूप:
पठति – वह पढ़ता है
पठतः – वे दो पढ़ते हैं
पठन्ति – वे पढ़ते हैं
धातु का महत्व
धातु का संस्कृत भाषा में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। इसके महत्व को निम्न बिंदुओं से समझा जा सकता है –
भाषा की मूल इकाई – संस्कृत के अधिकांश शब्द धातुओं से बनते हैं।
व्याकरण की नींव – धातु के बिना संस्कृत व्याकरण अधूरा है।
शब्द निर्माण का आधार – एक धातु से अनेक शब्द बन सकते हैं।
वाक्य निर्माण में सहायता – धातु से क्रिया बनती है, जिससे वाक्य पूर्ण होता है।
भाषा को वैज्ञानिक बनाती है – धातु के नियमों से भाषा व्यवस्थित रहती है।
धातु और संस्कृत की वैज्ञानिकता
संस्कृत भाषा की वैज्ञानिकता का एक बड़ा कारण धातु प्रणाली है। प्रत्येक शब्द का एक मूल धातु से संबंध होता है। इससे शब्दों के अर्थ और निर्माण को समझना आसान हो जाता है। यही कारण है कि संस्कृत भाषा को विश्व की सबसे व्यवस्थित भाषाओं में गिना जाता है।
निष्कर्ष
धातु संस्कृत भाषा की मूल शक्ति है। यह शब्दों और क्रियाओं की उत्पत्ति का आधार है। धातु के माध्यम से ही संस्कृत भाषा की विशाल शब्दावली का निर्माण हुआ है। यदि किसी विद्यार्थी को संस्कृत भाषा में दक्ष होना है तो उसे धातुओं का ज्ञान अवश्य होना चाहिए।
इस प्रकार कहा जा सकता है कि धातु संस्कृत व्याकरण की नींव है और उसके बिना संस्कृत भाषा की संरचना को समझना संभव नही है।
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